Saturday, August 8, 2026
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2046 तक कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक रोडमैप बनाएगा उत्तराखंड

पंतनगर। उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2046 तक राज्य के कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए दीर्घकालिक कृषि रोडमैप तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादकता बढ़ाने, ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने, रोजगार सृजन करने और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देकर उत्तराखंड को देश के अग्रणी कृषि राज्यों में शामिल करना है।

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति प्रो. (डॉ.) शिवेन्द्र कुमार कश्यप को इस महत्वाकांक्षी योजना का समन्वयक नियुक्त किया गया है। उन्होंने बताया कि रोडमैप जिलेवार और जमीनी स्तर की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा, जिससे राज्य की विविध भौगोलिक एवं कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप विकास योजनाएं बनाई जा सकें।

कृषि सचिव डॉ. एस. एन. पांडेय के नेतृत्व में चल रहे इस कार्य में पंतनगर विश्वविद्यालय, वानिकी एवं उद्यानिकी विश्वविद्यालय भरसार के वैज्ञानिकों, विभिन्न विभागों के अधिकारियों तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। रोडमैप में कृषि के साथ-साथ उद्यानिकी, पशुपालन, वानिकी, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, पलायन और रोजगार सृजन सहित 21 प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है।

इसके अलावा मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, पुष्प उत्पादन, औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती, मत्स्य पालन, कृषि पर्यटन, कृषि प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। इन गतिविधियों को संबंधित क्षेत्रों की संभावनाओं के अनुसार विकसित करने की योजना है।

रोडमैप की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह होगी कि राज्य के सभी 13 जिलों के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार की जाएगी। चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जैसे उच्च हिमालयी जिलों में समशीतोष्ण फलोत्पादन, औषधीय पौधों की खेती, जैव विविधता संरक्षण और कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा। वहीं हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में खाद्यान्न उत्पादन, कृषि प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर फोकस रहेगा। देहरादून और नैनीताल जैसे मिश्रित भौगोलिक क्षेत्रों में विकासखंड स्तर पर अलग-अलग योजनाएं बनाई जा सकती हैं।

योजना के तहत वर्ष 2031, 2036, 2041 और 2046 के लिए मापनीय लक्ष्य निर्धारित किए जाएंगे। प्रत्येक जिले में डेटा संग्रह और परामर्श के लिए नोडल व्यवस्था स्थापित की जाएगी तथा 21 विषयगत समूहों से प्राप्त आंकड़ों को एक साझा डिजिटल डैशबोर्ड पर एकीकृत किया जाएगा, जिससे प्रगति की निरंतर निगरानी की जा सके।

रोडमैप में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है। अनियमित वर्षा, सूखे जैसी परिस्थितियां, तापमान में बदलाव और कृषि भूमि के बढ़ते परतीकरण को ध्यान में रखते हुए जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों, उन्नत फसल किस्मों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही पहाड़ों से पलायन, युवाओं की कृषि में घटती रुचि और जैव विविधता में कमी जैसी समस्याओं के समाधान पर भी कार्य किया जाएगा।

प्रो. कश्यप ने कहा कि गांवों में टिकाऊ रोजगार और कृषि आधारित आजीविका के अवसर विकसित कर ही पलायन को रोका जा सकता है तथा रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके लिए कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी बनाना आवश्यक है।

रोडमैप तैयार करने के दौरान न्यूजीलैंड, आयरलैंड और चीन जैसे देशों के सफल कृषि विकास मॉडल का भी अध्ययन किया जा रहा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और वैज्ञानिक ज्ञान को उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जा सके।

उन्होंने कहा कि यह पहल शिक्षा जगत, उद्योग और सरकार के बीच समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रोडमैप तैयार करना पहला चरण है, जबकि उसका प्रभावी क्रियान्वयन, संसाधनों की उपलब्धता और निरंतर निगरानी भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी। राज्य सरकार इस रोडमैप को केवल नीति दस्तावेज नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में कृषि विकास का व्यवहारिक और परिणाम आधारित मार्गदर्शक दस्तावेज बनाना चाहती है।

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